Pandit Kaushal Pandey

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गर्व से कहो हम सनातनी हिन्दू है

गर्व से कहो हम सनातनी हिन्दू है
गर्व से कहो हम सनातनी हिन्दू  है


प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म में कुछ नियम चले आ रहे है जिनका पालन सभी हिंदू धर्म वालो को अवश्य करना चाहिए जैसे -
प्रात: काल के नियम:-
।।कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती।कर पृष्ठे स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्‌॥
*प्रात:काल जब निद्रा से जागते हैं तो सर्व प्रथम बिस्तर पर ही हाथों की दोनों हथेलियों को खोलकर उन्हें आपस में जोड़कर उनकी रेखाओं को देखते हुए उक्त का मंत्र एक बार मन ही मन उच्चारण करते हैं और फिर हथेलियों को चेहरे पर फेरते हैं।
पश्चात इसके भूमि को मन ही मन नमन करते हुए पहले दायाँ पैर उठाकर उसे आगे रखते हैं और फिर शौचआदि से निवृत्त होकर पाँच मिनट का ध्यान या संध्यावंदन करते हैं। शौचआदि के भी नियम है।
*संध्यावंदन :
शास्त्र कहते हैं कि संध्यावंदन पश्चात ही किसी कार्य को किया जाता है। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे मुख्यत: संधि पाँच-आठ वक्त की होती है, लेकिन प्रात: काल और संध्या काल- उक्त दो वक्त की संधि प्रमुख है। अर्थात सूर्य उदय और अस्त के वक्त। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से परमेश्वर की प्रार्थना की जाती है।
*घर से बाहर जाते वक्त : घर (गृह) से बाहर जाने से पहले माता-पिता के पैर छुए जाते हैं फिर पहले दायाँ पैर बाहर निकालकर सफल यात्रा और सफल मनोकामना की मन ही मन ईश्वर के समक्ष इच्छा व्यक्त की जाती है।
*किसी से मिलते वक्त : कुछ लोग राम-राम, गुड मार्नींग, जय श्रीकृष्ण, जय गुरु, हरि ओम, साई राम या अन्य तरह से अभीवादन करते हैं। लेकिन संस्कृत शब्द नमस्कार को मिलते वक्त किया जाता है और नमस्ते को जाते वक्त।
फिर भी कुछ लोग इसका उल्टा भी करते हैं। विद्वानों का मानना हैं कि नमस्कार सूर्य उदय के पश्चात्य और नमस्ते सुर्यास्त के पश्चात किया जाता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुओं ने अभिवादन के अपने-अपने तरीके इजाद कर लिए हैं जो की गलत है।
भोजन-पानी के हिन्दू नियम
पशु, पक्षी, पितर, दानव और देवताओं की जीवन चर्या के नियम होते हैं, लेकिन मानव अनियमित जीवन शैली के चलते धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से अलग हो चला है। रोग और शोक की गिरफ्त में आकर समय पूर्व ही वह दुनिया को अलविदा कह जाता है। नियम विरुद्ध जीवन जीने वाला व्यक्ति ही दुनिया को खराब करने का जिम्मेदार है। शास्त्र कहते हैं कि 'नियम ही धर्म है।'
सनातन धर्म ने हर एक हरकत को नियम में बाँधा है और हर एक नियम को धर्म में। यह नियम ऐसे हैं जिससे आप किसी भी प्रकार का बंधन महसूस नहीं करेंगे, बल्कि यह नियम आपको सफल और निरोगी ही बनाएँगे। नियम से जीना ही धर्म है।
भोजन के नियम :
भोजन की थाली को पाट पर रखकर भोजन किसी कुश के आसन पर सुखासन में (आल्की-पाल्की मारकर) बैठकर ही करना चाहिए। भोजन करते वक्त मौन रहने से लाभ मिलता है। भोजन भोजनकक्ष में ही करना चाहिए। भोजन करते वक्त मुख दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। जल का ग्लास हमेशा दाईं ओर रखना चाहिए। भोजन अँगूठे सहित चारो अँगुलियों के मेल से करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को साथ मिल-बैठकर ही भोजन करना चाहिए। भोजन का समय निर्धारित होना चाहिए।
शास्त्र कहते हैं कि योगी एक बार और भोगी दो बार भोजन ग्रहण करता है। रात्रि का भोजन निषेध माना गया है। भोजन करते वक्त थाली में से तीन ग्रास (कोल) निकाल कर अलग रखें जाते हैं तथा अँजुली में जल भरकर भोजन की थाली के आसपास दाएँ से बाएँ गोल घुमाकर अँगुली से जल को छोड़ दिया जाता है।
अँगुली से छोड़ा गया जल देवताओं के लिए और अँगूठे से छोड़ा गया जल पितरों के लिए होता है। यहाँ सिर्फ देवताओं के लिए जल छोड़ा जाता है। यह तीन कोल ब्रह्मा, विष्णु और महेष के लिए या मन कथन अनुसार गाय, कव्वा और कुत्ते के लिए भी रखा जा सकता है।
भोजन के तीन प्रकार :
जैसा खाओगे अन्न वैसा बनेगा मन। भोजन शुद्ध और सात्विक होना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि सात्विक भोजन से व्यक्ति का मन सकारात्मक सोच वाला व मस्तिष्क शांतिमय बनता है। इससे शरीर स्वस्थ रहकर निरोगी बनता है। राजसिक भोजन से उत्तेजना का संचार होता है, जिसके कारण व्यक्ति में क्रोध तथा चंचलता बनी रहती है। तामसिक भोजन द्वारा आलस्य, अति नींद, उदासी, उदासी, सेक्स भाव और नकारात्मक धारणाओं से व्यक्ति ग्रसित होकर चेतना को गिरा लेता है।
सात्विक भोजन से व्यक्ति चेतना के तल से उपर उठकर निर्भिक तथा होशवान बनता है और तामसिक भोजन से चेतना में गिरावट आती है जिससे व्यक्ति मूढ़ बनकर भोजन तथा संभोग में ही रत रहने वाला बन जाता है। राजसिक भोजन व्यक्ति को जीवन पर्यंत तनावग्रस्त, चंचल, भयभीत और अति भावुक बनाए रखकर सांसार में उलझाए रखता है।
जल के नियम :
भोजन के पूर्व जल का सेवन करना उत्तम, मध्य में मध्यम और भोजन पश्चात करना निम्नतम माना गया है। भोजन के एक घंटा पश्चात जल सेवन किया जा सकता है। भोजन के पश्चात थाली या पत्तल में हाथ धोना भोजन का अपमान माना गया है। दो वक्त का भोजन करने वाले के लिए जरूरी है कि वह समय के पाबंद रहें। संध्या काल के अस्त के पश्चात भोजन और जल का त्याग कर दिया जाता है।
पानी छना हुआ होना चाहिए और हमेशा बैठकर ही पानी पीया जाता है। खड़े रहकर या चलते फिरते पानी पीने से ब्लॉडर और किडनी पर जोर पड़ता है। पानी ग्लास में घुंट-घुंट ही पीना चाहिए। अँजुली में भरकर पीए गए पानी में मीठास उत्पन्न हो जाती है। जहाँ पानी रखा गया है वह स्थान ईशान कोण का हो तथा साफ-सुधरा होना चाहिए। पानी की शुद्धता जरूरी है।
विशेष : भोजन खाते या पानी पीते वक्त भाव और विचार निर्मल और सकारात्मक होना चाहिए। कारण की पानी में बहुत से रोगों को समाप्त करने की क्षमता होती है और भोजन-पानी आपकी भावदशा अनुसार अपने गुण बदलते रहते हैं।
नींद और जागरण के नियम
सनातन धर्म ने हर एक हरकत को नियम में बांधा है और यह नियम ऐसे हैं जिससे आप किसी भी प्रकार का बंधन महसूस नहीं करेंगे, बल्कि यह नियम आपको सफल और निरोगी ही बनाएंगे। जागना और सोना रात और दिन के जैसा नियमित रहना चाहिए।
वर्तमान भौतिक व्यस्तता के समय में प्राय: रात्रि में देर से शयन करने तथा प्रात: देर से जागने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिसके कारण अनेक समस्याओं का जन्म होता है। व्यवहार में असंतुलन के कारण सामाजिक वातावरण कुप्रभावित होता है।
अच्छी नींद हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है और अच्छा जागरण हमारी चेतना के विकास और जीवन में सफलता के लिए जरूरी है। नियम से चलना जरूरी है वर्ना प्रकृति हमें जिंदगी से बाहर कर देती है।
नींद के नियम :-
1.हम कब सोएं और कब उठे?
रात्रि के पहले प्रहर में सो जाना चाहिए और ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संध्यावंदन करना चाहिए। लेकिन आधुनिक जीवनशैली के चलते यह संभव नहीं है तब क्या करें? तब नीचे के दूसरे पाइंट पर तो अमल कर ही सकते हैं। फिर भी जल्दी सोने और जल्दी उठने का प्रयास करें।
2.हम कैसे लेटे और हमारा सिर और पैर किस दिशा में हो?
हमें शवासन में सोना चाहिए इससे आराम मिलता है कभी करवट भी लेना होतो बाईं करवट लें। बहुत आवश्यक हो तभी दाईं करवट लें। सिर को हमेशा पूर्व या दक्षिण दिशा में रखकर ही सोना चाहिए। पूर्व या दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोने से लंबी उम्र एवं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
2.क्यों नहीं रखते पूर्व दिशा में पैर?
पश्चिम दिशा में सिर रखकर नहीं सोते हैं क्योंकि तब हमारे पैर पूर्व दिशा की ओर होंगे जो कि शास्त्रों के अनुसार अनुचित और अशुभ माने जाते हैं। पूर्व में सूर्य की ऊर्जा का प्रवाह भी होता है और पूर्व में देव-देवताओं का निवास स्थान भी माना गया है।
क्यों नहीं रखते दक्षिण दिशा में पैर?
विज्ञान की दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी के दोनों ध्रुवों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में चुम्बकीय प्रवाह विद्यमान है। दक्षिण में पैर रखकर सोने से व्यक्ति की शारीरिक ऊर्जा का क्षय हो जाता है और वह जब सुबह उठता है तो थकान महसूस करता है, जबकि दक्षिण में सिर रखकर सोने से ऐसा कुछ नहीं होता।
उत्तर दिशा की ओर धनात्मक प्रवाह रहता है और दक्षिण दिशा की ओर ऋणात्मक प्रवाह रहता है। हमारा सिर का स्थान धनात्मक प्रवाह वाला और पैर का स्थान ऋणात्मक प्रवाह वाला है। यह दिशा बताने वाले चुम्बक के समान है कि धनात्मक प्रवाह वाले आपस में मिल नहीं सकते।
हमारे सिर में धनात्मक ऊर्जा का प्रवाह है जबकि पैरों से ऋणात्मक ऊर्जा का निकास होता रहता है। यदि हम अपने सिर को उत्तर दिशा की ओर रखेंगे को उत्तर की धनात्मक और सिर की धनात्मक तरंग एक दूसरे से विपरित भागेगी जिससे हमारे मस्तिष्क में बेचैनी बढ़ जाएगी और फिर नींद अच्छे से नहीं आएगी। लेकिन जैसे तैसे जब हम बहुत देर जागने के बाद सो जाते हैं तो सुबह उठने के बाद भी लगता है कि अभी थोड़ा और सो लें।
जबकि यदि हम दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर सोते हैं तो हमारे मस्तिष्क में कोई हलचल नहीं होती है और इससे नींद अच्छी आती है। अत: उत्तर की ओर सिर रखकर नहीं सोना चाहिए।
*सोने के तीन से चार घंटे पूर्व जल और अन्य का त्याग कर देना चाहिए। शास्त्र अनुसार संध्याकाल बितने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
जागरण के नियम :-
शास्त्र कहते हैं तामसिक भोजन करने वाले और तामसिक प्रवृत्ति के लोग मूर्छा में जिते हैं और मूर्छा में ही मर जाते हैं। वे उस जानवर की तरह है जिसका सिर भूमि में ही धंसा रहता है। यह रेंगने वाले कीड़ों जैसी जिंदगी है। आपके कार्य, व्यवहार और प्रवृत्ति से पता चलता है कि आप कितने मूर्छित हैं।
जागने का महत्व समझना जरूरी है। कुछ लोग जागकर भी सोए-सोए से रहते हैं। अत्यधिक विचार, कल्पना या खयालों में खोए रहना भी नींद का हिस्सा है इसे दिव्यास्वप्न कहते हैं। इससे जागरण खंडित होता है। किसी भी प्रकार के नशे से भी जागरण खंडित होता है, इसलिए हर तरह का नशा शास्त्र विरुद्ध माना गया है।
ब्रह्म मुहूर्त : ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से मनुष्य की दिनचर्या नियमित होती है और वह अभिवादन, नित्यकर्म, मांगलिक वस्तुओं का दर्शन, व्यायाम, स्नान, जप, भोजन व विश्रामादि के लिए उचित समय प्राप्त कर लेता है। सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व का समय ब्रांह्मामुहूर्त कहलाता है।
ब्रह्म मुहूर्त के लाभ : वेद कहते हैं-समस्त बुद्धियां प्रात:काल के साथ जाग्रत होती हैं। वस्तुत: ब्रांह्मामुहूर्त आध्यात्मिक जागरण का शुभ प्रतीक है। इस समय जागरण से शारीरिक व मानसिक शक्ति का विकास होने के साथ ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है। रक्त में शुद्धता, बुद्धि का विकास, एकाग्रता में सरलता, चिंतन में तन्मयता तथा रोगों के आक्रमण से लड़ने की क्षमता इस मुहूर्त में जागने का परिणाम है।
मनोरंजन है मूर्छा : मनोरंजन में अधिक रमना, बहस या वार्तालाप में अत्यधिक रुचि लेने से भी जागरण में व्यवधान उत्पन्न होता है। मनोरंजन से मूर्छा पैदा होती है। मन को भटकाने के बजाय मनोरंज को भी ध्यान बनाया जा सकता है। इससे जागरण की रक्षा होगी।
पूर्ण जागरण : आदमी सर्वप्रथम जागता है चेतना से, तभी आंखें खुलती है। जागने के कुछ देर तक नींद की खुमारी छाई रहती है या कहें कि नींद का असर रहता है। यह वैसा ही है कि रात जबकि ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य का प्रकाश फैलने वाला रहता है, लेकिन फिर भी कुछ-कुछ अंधेरा भी रहता है। जागते ही सर्वप्रथम हथेलियों को देखकर शुभ मंत्र और शुभदिन की कामना करनी चाहिए।
पूरी तरह से जागकर जीना ही सही है। अर्धजाग्रत अवस्था में रहकर जीने से जहां सेहत पर असर होता है वहीं मस्तिष्क को आलस्य की आदत हो जाती है जिससे स्मृतियों का क्षय होने लगता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी कार्य में स्वयं का 100 प्रतिशत नहीं दे पाता।
साक्षी भाव ही सही जागरण : ध्यान या साक्षी भाव में रहने से जागरण बढ़ता है। उपनिषद् कहते हैं देखने वाले को देखना ही साक्षी भाव है।
जागरण का लाभ : शुद्ध रूप से जागे रहने से जहां मस्तिष्क का विकास होता है वहीं अंतर्दृष्टि बढ़ती है। भय, चिंता और किसी भी प्रकार का मानसिक विकार जागरण से दूर हो जाता है। इससे आत्मबल की प्राप्ति होती है।
जागरण से रोग और शोक मिटते हैं तथा मृत्युकाल में व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता साथ ही मरने के बाद उसके जागरण के अभ्यास की बदौलत वह गहरी नींद में जाने से बच जाता है। ऐस व्यक्ति पूर्णत: जानता है कि मैं मर चुका हूं। जागरण का अभ्यास करने वाला अमर हो जाता है।
पंडित के एन पाण्डेय (कौशल)+919968550003 ज्योतिष,वास्तु शास्त्र व राशि रत्न विशेषज्ञ

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